किसी से क्या गिला करूँ

मेरी अजब है ज़िन्दगी किसी से क्या गिला करूँ
तक़दीर रूठ जाए तो मेरे ख़ुदा मैं क्या करूँ
मंज़िल की थी तलाश तो ग़र्द-ए-सफ़र मिली मुझे
आँखें बरस पड़ी मेरी काली घटा को क्या करूँ